रोशनी झरती हुई हो
जिसके कदमों के तले
...प्यास, इक उतरी हुई दरिया
कि जैसे बह चले
प्यास जो छेड़ो
तो धुन सरगम के बिखरेंगे हुजूर
प्यास जो कौंधे तो फिर
कातिल से मिलती है गले
Thursday, October 15, 2009
Thursday, October 1, 2009
गो कि
दिल के हलकों में छुपी गहराइयाँ
और हर सूँ ढेर सी रुसवाइयाँ
लौ सरीखी रात भर हिलती रहीं
आँसुओं की भाप में सच्चाइयाँ
दिल ने नज़रों में उतर करके कहा
आइनों में सिर्फ हैं परछाइयाँ
मुझको आखिर ले चलोगे किस तरफ
छूट जायेंगी मेरी तनहाइयाँ
जज्ब की मुझमें ही है शायद कमी
गो कि तुझमें है बहुत अच्छाइयाँ
और हर सूँ ढेर सी रुसवाइयाँ
लौ सरीखी रात भर हिलती रहीं
आँसुओं की भाप में सच्चाइयाँ
दिल ने नज़रों में उतर करके कहा
आइनों में सिर्फ हैं परछाइयाँ
मुझको आखिर ले चलोगे किस तरफ
छूट जायेंगी मेरी तनहाइयाँ
जज्ब की मुझमें ही है शायद कमी
गो कि तुझमें है बहुत अच्छाइयाँ
Thursday, May 7, 2009
Thursday, April 23, 2009
इम्तेहान
वफ़ा के पैरों में
अब तक
थकान बाकी है
न जाने कौन सा
फिर
इम्तेहान बाकी है
हमारे डैनों ने
चीरे हैं बादलों के बदन
हमारे पैरों तले आसमान बाकी है...
अब तक
थकान बाकी है
न जाने कौन सा
फिर
इम्तेहान बाकी है
हमारे डैनों ने
चीरे हैं बादलों के बदन
हमारे पैरों तले आसमान बाकी है...
Friday, March 6, 2009
इंतिखाब
दिल की
उजली सी धूप में
तुमको
कितना खामोश
खुद में देखा है
एक लम्हे की
प्यास थी जिसको
एक सैलाब
इंतिखाब मिला
उजली सी धूप में
तुमको
कितना खामोश
खुद में देखा है
एक लम्हे की
प्यास थी जिसको
एक सैलाब
इंतिखाब मिला
Thursday, January 22, 2009
हम गोद में जिनके हैं
ये लोग उम्मीदों को
चुटकी में मसल देंगे..
गुलशन में क़तल करके
चुपके से निकल लेंगे..
हम कुछ न कहें लेकिन
हर हाल में ये तय है
हम गोद में जिनके हैं
वे हमको निगल लेंगे..
चुटकी में मसल देंगे..
गुलशन में क़तल करके
चुपके से निकल लेंगे..
हम कुछ न कहें लेकिन
हर हाल में ये तय है
हम गोद में जिनके हैं
वे हमको निगल लेंगे..
Friday, November 28, 2008
पर्दाफाश
दहक रहा है देश
स्वार्थपरताओं के चलते
ठगी खड़ी है
मानवता बस हाथों को मलते
हिंसा नंगी नाच रही है
हौव्वा बन करके
अपनी परछाईं से सहमे
कटते रहो..मरो..
...
या बढ़कर आतंकवाद का
पर्दाफाश करो।
स्वार्थपरताओं के चलते
ठगी खड़ी है
मानवता बस हाथों को मलते
हिंसा नंगी नाच रही है
हौव्वा बन करके
अपनी परछाईं से सहमे
कटते रहो..मरो..
...
या बढ़कर आतंकवाद का
पर्दाफाश करो।
Wednesday, November 12, 2008
अंगरेज
ये रोज़मर्रा की
परछाइयों का
जंगल है
यहां हवायें
अगर तेज हैं
तो अच्छा है
हम ऐसे लोग
यहां बर्फबारी
करते हैं
हमें समझते सब
अंगरेज हैं
तो अच्छा है...
परछाइयों का
जंगल है
यहां हवायें
अगर तेज हैं
तो अच्छा है
हम ऐसे लोग
यहां बर्फबारी
करते हैं
हमें समझते सब
अंगरेज हैं
तो अच्छा है...
Monday, October 27, 2008
दीप
हुआ कभी जो उसको
हमको फिर दुहराना है..
तिरा शिलायें जल पर
सागर पार कराना है..
दीवाली पर हमने जो
ये दीप सजाये हैं,
बाती से लौ का रिश्ता वो
बहुत पुराना है...
हमको फिर दुहराना है..
तिरा शिलायें जल पर
सागर पार कराना है..
दीवाली पर हमने जो
ये दीप सजाये हैं,
बाती से लौ का रिश्ता वो
बहुत पुराना है...
प्रकाशपर्व
हमने मनाया
झूम के कुछ यूं प्रकाशपर्व
जीवन ही सारा
आरती की तरह
सज गया
बाहों में हमने
कर लिया तारों भरा आकाश
बरबस सा चांद
झील में गहरे उतर गया
झूम के कुछ यूं प्रकाशपर्व
जीवन ही सारा
आरती की तरह
सज गया
बाहों में हमने
कर लिया तारों भरा आकाश
बरबस सा चांद
झील में गहरे उतर गया
Sunday, October 26, 2008
माखनचोर
माखनचोर बनाये प्रभु को
प्रभु की चोर आप खुद दुनिया
देखो क्या-क्या रंग दिखाये
खोकर अपनी सुधबुध दुनिया
प्रभु की चोर आप खुद दुनिया
देखो क्या-क्या रंग दिखाये
खोकर अपनी सुधबुध दुनिया
Saturday, October 18, 2008
निशांदेही
तेरी आंखें शिकारियों सी सधी
मेरे मन के पटल पे तैर गयीं
नींद चिंहुकी तो, पाया जैसे इन्हें
मुद्दतों से तलाश मेरी थी
कितने जन्मों की प्यास थी कि जिसे
सातवें आसमान की थी खबर
रूह के साथ जिसकी जद्दोजहद
रूह के आरपार तैरी थी
और फिर सिर्फ जिसके ही खातिर
बूंद बन कर मेरा उतरना हुआ
उस जलनखोर की निशांदेही
मेरी सूरत में आ के ठहरी थी
* * *
विषबुझे तीर सी तुम्हारी हंसी
दर्द से अकड़ा हुआ मेरा बदन
हर तरफ जकड़ी हुई जंजीरें
जिन्दगी बांह तक उधेड़ी थी
मेरी दो-चश्मी रूह के पीछे
जिन अंधेरों में तुम चमकती रहीं
मैं उन्हें चीर करके लौटा हूं
जिस जगह पर मज़ार मेरी थी
मेरे मन के पटल पे तैर गयीं
नींद चिंहुकी तो, पाया जैसे इन्हें
मुद्दतों से तलाश मेरी थी
कितने जन्मों की प्यास थी कि जिसे
सातवें आसमान की थी खबर
रूह के साथ जिसकी जद्दोजहद
रूह के आरपार तैरी थी
और फिर सिर्फ जिसके ही खातिर
बूंद बन कर मेरा उतरना हुआ
उस जलनखोर की निशांदेही
मेरी सूरत में आ के ठहरी थी
* * *
विषबुझे तीर सी तुम्हारी हंसी
दर्द से अकड़ा हुआ मेरा बदन
हर तरफ जकड़ी हुई जंजीरें
जिन्दगी बांह तक उधेड़ी थी
मेरी दो-चश्मी रूह के पीछे
जिन अंधेरों में तुम चमकती रहीं
मैं उन्हें चीर करके लौटा हूं
जिस जगह पर मज़ार मेरी थी
Monday, September 22, 2008
मां की वह कोख
जो आजाद होकर के होना था ऐसा
तो उससे हमारी गुलामी भली थी
नजर तो चुराना न था एक दूजे से
नफरत तो दिल में न ऐसी पली थी
कभी भाई हमने ये सोचा नहीं था कि
कि अब अस्पतालों में होंगे धमाके
जो जांबाजी का सिर्फ यह नमूना
तो फिर मां की वह कोख खाली भली थी
जो आजाद होकर के होना था ऐसा
तो उससे हमारी गुलामी भली थी
तो उससे हमारी गुलामी भली थी
नजर तो चुराना न था एक दूजे से
नफरत तो दिल में न ऐसी पली थी
कभी भाई हमने ये सोचा नहीं था कि
कि अब अस्पतालों में होंगे धमाके
जो जांबाजी का सिर्फ यह नमूना
तो फिर मां की वह कोख खाली भली थी
जो आजाद होकर के होना था ऐसा
तो उससे हमारी गुलामी भली थी
Tuesday, August 19, 2008
Friday, May 2, 2008
बीता है जो
जो बोले है मुझमें से 'मैं'
वह मुझमें या कहीं और है
जीवन का आखिर सच क्या है
'होना' खुद में किस बतौर है
खुली हुई पलकों का सच ही
सच-नगरी का महापौर है
जीवन लुभा रहा है खुद को
लिए हाथ में एक कौर है
यह तो हर्जाना है दिल का
बीता है जो, तुम्हें गौर है?
वह मुझमें या कहीं और है
जीवन का आखिर सच क्या है
'होना' खुद में किस बतौर है
खुली हुई पलकों का सच ही
सच-नगरी का महापौर है
जीवन लुभा रहा है खुद को
लिए हाथ में एक कौर है
यह तो हर्जाना है दिल का
बीता है जो, तुम्हें गौर है?
Saturday, April 26, 2008
निगहबां
मैं चाहता हूं ये हो साथ साथ वो भी हो
पर जिसमें रजामंदी हो मर्जी भी तेरी हो
हमको बताइये कि हम हों गुनहगार क्यूं
अच्छा हो या बुरा हो निगहबां तो तुम ही हो।
पर जिसमें रजामंदी हो मर्जी भी तेरी हो
हमको बताइये कि हम हों गुनहगार क्यूं
अच्छा हो या बुरा हो निगहबां तो तुम ही हो।
Sunday, April 20, 2008
करम के लेख
एक आंख कुछ और देखती
है दूजी कुछ देखे
एक करम के लेख बांचती
दूजी पल-पल जोखे
पल-पल धोखे खेल तमाशे
भीड़भाड़ दुनिया की
बढ़ते जाओ भी बस आगे
खुद को रोके-रोके
है दूजी कुछ देखे
एक करम के लेख बांचती
दूजी पल-पल जोखे
पल-पल धोखे खेल तमाशे
भीड़भाड़ दुनिया की
बढ़ते जाओ भी बस आगे
खुद को रोके-रोके
Friday, March 21, 2008
इक नन्हा यकीं
वो हर जर्रे में है मौजूद
ये होली बताती है..
बताती है कि
इक नन्हा यकीं
क्या गुल खिलाता है..
..बगावत है जरूरी
आड़े वालिद ही न खुद क्यूं हो
है वाजिब जंग जब
हैवान कोई जुल्म ढ़ाता है
..अजब फितरत है
मगरूरी
कि इसकी जज्ब में आकर
अकड़कर
खाक का पुतला
खुदी को रब
बताता है...
ये होली बताती है..
बताती है कि
इक नन्हा यकीं
क्या गुल खिलाता है..
..बगावत है जरूरी
आड़े वालिद ही न खुद क्यूं हो
है वाजिब जंग जब
हैवान कोई जुल्म ढ़ाता है
..अजब फितरत है
मगरूरी
कि इसकी जज्ब में आकर
अकड़कर
खाक का पुतला
खुदी को रब
बताता है...
Thursday, March 13, 2008
मुसाफिर
हमीं नहीं हैं मुसाफिर...
हैं चांद सूरज भी
दरअसल,
पार हमें जुस्तजू को करना है...
हमारे जेहन में
पलती है जुगनुओं की तरह
उसी की कौंध में
अब हमको वजू करना है
हैं चांद सूरज भी
दरअसल,
पार हमें जुस्तजू को करना है...
हमारे जेहन में
पलती है जुगनुओं की तरह
उसी की कौंध में
अब हमको वजू करना है
Monday, March 10, 2008
तनिक ठहर कर
अपनापन जैसा
जो हममें है
उसको आंखों से देखें
आओ देखें हम जो नहीं हों
तो आखिर फिर बचता क्या है
हम जिसको कहते हैं जीवन
मौत कि जिससे घबराते हैं
अन्तर्मन की ज्योति जलाकर
देखें आखिर पर्दा क्या है
नचा रहा है हमें
मदारी जो
बंदर जैसा दुनिया में
आओ तनिक ठहर कर देखें
खुद वो आखिर करता क्या है
जो हममें है
उसको आंखों से देखें
आओ देखें हम जो नहीं हों
तो आखिर फिर बचता क्या है
हम जिसको कहते हैं जीवन
मौत कि जिससे घबराते हैं
अन्तर्मन की ज्योति जलाकर
देखें आखिर पर्दा क्या है
नचा रहा है हमें
मदारी जो
बंदर जैसा दुनिया में
आओ तनिक ठहर कर देखें
खुद वो आखिर करता क्या है
Sunday, March 9, 2008
कुतूहल
द्रुत गति से बहती सरिता की कलकल है
या विस्मय के होठों पर ठहरा पल है
काश, कभी आगे भी इसके जान सकूं
अभी तो नारी मेरे लिए कुतूहल है
या विस्मय के होठों पर ठहरा पल है
काश, कभी आगे भी इसके जान सकूं
अभी तो नारी मेरे लिए कुतूहल है
Tuesday, January 1, 2008
हक
वक्त जिससे कि सभी डरते हैं
खुद वो हक को सलाम करता है।
उस पर हर रहमतें बरसती हैं
इश्क जिस पर मुकाम करता है।
खुद वो हक को सलाम करता है।
उस पर हर रहमतें बरसती हैं
इश्क जिस पर मुकाम करता है।
Saturday, November 24, 2007
ओ जयन्त
धमाकों में
सिकुड़ जाता है मन थोड़ा सा
...ज्यादा फैलता है
ओ जयन्त,
याद है कुछ...
चक्षु-विक्षत चरण सीता के
तुम्हारे दृगों को फिर
संतुलित होने न देंगे..
कहां भागोगे
किधर जाओगे आखिर भागकर तुम
सींक जब
बन जायेगी शर राम का, तब
कौन देगा आश्रय फिर
ओ जयन्त
....................
यह तप-स्थली है
शोर करने की यहां अनुमति नहीं है।
.....................
राम वह जो गंध में उपवन समेटे
रम रहा हर पुष्प में है
और सीता
ओस झिलमिल
चांद के उपहार जैसी
रजत किरनों में
सजग सी
चिन्मया द्युति।
सिकुड़ जाता है मन थोड़ा सा
...ज्यादा फैलता है
ओ जयन्त,
याद है कुछ...
चक्षु-विक्षत चरण सीता के
तुम्हारे दृगों को फिर
संतुलित होने न देंगे..
कहां भागोगे
किधर जाओगे आखिर भागकर तुम
सींक जब
बन जायेगी शर राम का, तब
कौन देगा आश्रय फिर
ओ जयन्त
....................
यह तप-स्थली है
शोर करने की यहां अनुमति नहीं है।
.....................
राम वह जो गंध में उपवन समेटे
रम रहा हर पुष्प में है
और सीता
ओस झिलमिल
चांद के उपहार जैसी
रजत किरनों में
सजग सी
चिन्मया द्युति।
उसे छू ना सकोगे
वो जगह
हलचल जहां कोई नहीं है
है दिलों के बीच
दिल के तार जुड़ते हैं
जहां आपस में
उसका अक्स
उसके नक्श
हर दिल में निहां हैं..
..उसे छू ना सकोगे
इस तरह विस्फोट करके तुम
..जो कुछ
तुम सोचते हो..
क्या उसे
झकझोर पाओगे..
कंटीली झाडि़यों की तरह
बस झर जाओगे
................
हिलमिलकर तुम्हें रहना भला
क्यूंकर नहीं आता
किसी तरह खुलो
पकड़ो कोई रिश्ता..कोई नाता
................
जो ऊपर से उतर कर झांकता है
सबकी आंखों से
..कि कुछ ओझल नहीं उससे
करो कोई जतन
वह दिल के भीतर झांक लेता है।
हलचल जहां कोई नहीं है
है दिलों के बीच
दिल के तार जुड़ते हैं
जहां आपस में
उसका अक्स
उसके नक्श
हर दिल में निहां हैं..
..उसे छू ना सकोगे
इस तरह विस्फोट करके तुम
..जो कुछ
तुम सोचते हो..
क्या उसे
झकझोर पाओगे..
कंटीली झाडि़यों की तरह
बस झर जाओगे
................
हिलमिलकर तुम्हें रहना भला
क्यूंकर नहीं आता
किसी तरह खुलो
पकड़ो कोई रिश्ता..कोई नाता
................
जो ऊपर से उतर कर झांकता है
सबकी आंखों से
..कि कुछ ओझल नहीं उससे
करो कोई जतन
वह दिल के भीतर झांक लेता है।
Saturday, November 10, 2007
धमाकों में सहमी
जहां लोगों के दिल
मुहब्बत से खाली
जहां दुनिया
रहमोकरम की सवाली
जहां पैसे वाले
गरीबों को देते
भर कर पटाखों में
कस करके गाली
दिवाली ये वो
पहले वाली नहीं है
धमाकों में सहमी
हुई है दिवाली
ये झूठी दिवाली
ये झूठी दिवाली
मुहब्बत से खाली
जहां दुनिया
रहमोकरम की सवाली
जहां पैसे वाले
गरीबों को देते
भर कर पटाखों में
कस करके गाली
दिवाली ये वो
पहले वाली नहीं है
धमाकों में सहमी
हुई है दिवाली
ये झूठी दिवाली
ये झूठी दिवाली
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